‘आजादी सिर्फ चरखे से नहीं क्रांतिकारियों के बलिदान से मिली’

वीके चहल

अपने एक लेख में भारत के स्वतंत्रता संग्राम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक के योगदान की बात आपके सामने रखी थी,जिसकेआज़ादी में योगदान को न जानें क्यों आजादी के बाद बनी पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू  के नेतृत्व वाली कोंग्रेस सरकार ने गुमनामी के अंधेरों में धकेल दिया था। आज मैं एक बात को और मिथ्या करना चाहता हूँ। जैसे- जैसे स्वतंत्रता दिवस का दिन नजदीक आता है वैसे – वैसे कांग्रेस इस बात का गुणगान शुरू कर देती है कि देश को आज़ादी चरखे से मिली है और बच्चो को भी बचपन से यही बताया जाता रहा है।

तो क्या हम यह मानकर चले कि जो देश की आज़ादी के लिए जो सैंकड़ों क्रांतिकारी शहीद हुए उनके बलिदान का कोई महत्व नहीं है। पूरा विश्व जानता है कि अनगिनत क्रांतिकारियों ने अपने लहू से भारत की आज़ादी की दास्तान लिखी। अंग्रेजी हुकूमत को भारत से उखाड़ने में अनगिनत देश के मतवालों ने अपने लहू की आहुति दी।

लगभग 76 साल पहले, 15 अगस्त 1947 की ऐतिहासिक तारीख को, भारत ब्रिटिश प्रभुत्व से मुक्त हो गया। यह कई आंदोलनों और संघर्षों की परिणति थी जो 1857 के ऐतिहासिक विद्रोह सहित ब्रिटिश शासन के समय में हुए। स्वतंत्रता कई क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानियों के प्रयासों के माध्यम से हासिल की गई थी, जिन्होंने इस संघर्ष का बीड़ा उठाया।

भारत की स्वतंत्रता के लिये अंग्रेजों के विरुद्ध आन्दोलन दो प्रकार का था, एक अहिंसक आन्दोलन एवं दूसरा सशस्त्र क्रान्तिकारी आन्दोलन। भारत की आज़ादी के लिए 1857 से 1947 के बीच जितने भी प्रयत्न हुए, उनमें स्वतंत्रता का सपना संजोये क्रान्तिकारियों और शहीदों की उपस्थित सबसे अधिक प्रेरणादायी सिद्ध हुई। वस्तुतः भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग है।

भारत से अंग्रेजों को बाहर करने के संघर्ष में देश के हर कोने के लोगों ने भाग लिया। उनमें से कई क्रांतिकारियों ने भारत को अंग्रेजों के अत्याचारी शासन से मुक्त करने के लिए अपना जीवन बलिदान कर दिया। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम ऐसे क्रांतिकारों के कारनामों से भरा पड़ा है जिन्होंने अपनी चिंगारी से युगों को रौशन किया। भारत में स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों ने अपने बलिदान से देश को स्वतंत्र कराने का मार्ग प्रशस्त किया है।

सरदार भगत सिंह, आजाद, राजगुरु, बी सुखदेव, राम प्रसाद बिस्मिल और सुभाष चंद्र बोस, वीर विनायक दामोदर सावरकर, गुलाब सिंह, अजीतसिंह, श्रीमती भीखाजी रुस्तम कामा, बाघा जतिन, लाला हरदयाल, और न जानें कितने भारत माता के सपूत नायक बनकर उभरे और इतिहास के पन्नों में दर्ज हुए. वहीं कुछ नाम गुमनामी के अंधेरे में कहीं खो से गए। (लेखक भाजपा से सम्बद्ध हैं)।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!