मेरी बात-

नरेश रोहिला

बस अड्डे को तरसता एक शहर

बीते शुक्रवार को एक तेरहवीं के सिलसिले में देहरादून से सहारनपुर के कस्बा गंगोह जाना हुआ। गंगोह सहारनपुर होकर जाना पडता है। समय से करीब सुबह नौ बजे देहरादून से चल पड़े। अन्दाजा था कि करीब चार घंटे में दोपहर एक बजे तक पहुंच जाएंगे। सहारनपुर जाकर पता चला है कि रोडवेज का अड्डा बदल गया। बस ने जेल चुंगी (अब महाराजा रणवीर सिंह रोहिला चौक ) पर छोड दिया। परिचालक से कहा कि बस स्टैंड नहीं चलोगे तो बोला यही स्टैंड है। जल्दी उतरो। स्टैंड क्या बसें बस देहरादून – सहारनपुर मुख्य सड़क पर ही बेतरतीब ढंग से खडी है। वहीं ई रिक्शा, टैम्पो आदि का जमावड़ा जिनके चालक बस सवारियों पर टूट पडते दिखाई दिए। एक- एक सवारी को हर कोई बाजू पकडकर ले जाने को तैयार। साथ में पत्नी बोली अब क्या करें। अब घंटाघर जाना पडेगा। ई- रिक्शा पकडी तो न जाने किस बात पर उसका चालक किसी से भिड गया। बडी मुश्किल से वह चला और घंटाघर पहुंचा। रिक्शा चालक को दो सवारियों के 40 रूपए पकडाए। अब अम्बाला रोड पर नकुड – गंगोह बस अड्डे के लिए बढे तो पता चला वह भी बदल गया। मानक मऊ चला गया।

अब हमने घंटाघर से मानकमऊ के लिए टैम्पो लिया। कम से कम 10 सवारी भरने के बाद वह आगे बढा जबकि उसकी क्षमता छह सवारी से ज्यादा नहीं होगी। बहरहाल मानकमऊ पहुंचे। टैम्पो वाले ने 20 लिए। दोपहर के एक बजे से ज्यादा का समय हो चुका था और हमें अब तक गंतव्य पर पहुंच जाना चाहिए था लेकिन रोडवेज और लोकल अड्डा बदलने से काफी विलंब हो गया। बहरहाल करीब सवा दो बजे हम गंगोह और ढाई बजे गंतव्य पर पहुंचे। तब तक तेरहवीं की रस्म बस निपटने को ही थी। यह पूरा वाक्या सिर्फ इसलिए बताया कि एक अड्डा बदल जाने से सहारनपुर आने – जाने वाला आम आदमी कितनी दुश्वारियां झेलता है। सवाल यह नहीं कि बसों के अड्डे क्यों बदले गए। प्रश्न यह है कि पिछले 50 सालों में भी सहारनपुर जैसे शहर के लिए एक स्थायी अड्डा सरकार क्यों नहीं तलाश पायी। पुराना रोडवेज रेलवे स्टेशन के पास जिला पंचायत कार्यालय के बाहर बना था। वह भी अड्डा कम आफिस ज्यादा था इसलिए कि वहां ज्यादातर बसें सडक पर ही खडी रहती थी। सुकून यह था कि आम आदमी को वहां से शहर के भीतर जाने या आसपास के गांव कस्बे में जाने में सहुलियत थी। रेलवे स्टेशन बिल्कुल जड में है इसलिए रेलवे स्टेशन जाने वाले और रेल से आने वालों के लिए भी लिए वह अच्छा था। लोकल बस स्टैंड के नजदीक होने से लोगों का समय और पैसा दोनों बचते थे। अब लोग परेशान है और प्रशासन और सरकार को कोस रहे हैं लेकिन शहर में बढती भीड और जाम से बचने के लिए इन बस अड्डो को शहर से बाहर स्थानांतरित करना भी आवश्यक रहा लेकिन क्या इससे पहले रोडवेज स्टैंड के लिए उचित स्थान की तलाश नहीं की जानी चाहिए थी जहां एक सुव्यवस्थित और यात्रियों की सुविधा से सम्पन्न बस अड्डा बनाया जा सकता। अब जेल चुंगी (महाराजा रणवीर सिंह रोहिला चौक ) पर रोडवेज की बसे खडी हो रही है। उत्तराखंड, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल से आने वाली बसें भी यहीं खडी होती है। देवबंद, मुजफ्फरनगर रूट की बसे भी यहीं मिलती है लेकिन कहीं से भी यह बस अड्डा नजर नहीं आता। सहारनपुर – देहरादून मुख्य मार्ग और नुमाईश कैम्प की ओर जाने वाली सडक पर बस बेतरतीब जमावड़ा है। वहीं ई रिक्शा और टैम्पो वालों की धमाचौकडी। यहीं मुख्य मार्ग पर बनाए गए कथित रोडवेज अड्डे पर यात्रियों के लिए शौचालय जैसी बुनियादी सुविधा तो क्या लघुशंका के लिए भी उचित स्थान नहीं है जिस कारण लोगों को सडक किनारे ही खडे होते देखा जा सकता है। जेल चुंगी (महाराजा रणवीर सिंह रोहिला चौक ) पर रोडवेज बसों के आने से वहां चाय पकौडी की दुकानों के तो अच्छे दिन आ गए लेकिन इस इलाके में रिहायशी लोगों के लिए बडा सिरदर्द खडा हो गया।

ऐसा ही हाल लोकल स्टैंड यानि नकुड – गंगोह बस अड्डे का है। गनीमत इतनी ही है कि वहां बसे एक बडे से प्लाट में जरूर खडी है लेकिन वहां भी कोई चहारदीवारी है और न ही यात्रियों के लिए शौचालय या लघुशंका के लिए स्थान। लोगों को बसों की आड लेकर ही लघुशंका के लिए खडा होना पडता है। कहना न होगा कि इससे खुले में गंदगी को भी बढावा मिलता है।

सहारनपुर उत्तर प्रदेश का एक बडा महानगर है जिसमें छोटे – बडे दर्जनों कस्बे और हजारों गांव आते हैं। इन सभी जगहों से और आसपास के शहरों के लोगों का रोज आना जाना रहता है। इसलिए भी कि सहारनपुर आज भी एक बडा बाजार है। सहारनपुर जनपद ने उप्र और देश को एक से बढकर एक जनप्रतिनिधि दिए हैं। जो केन्द्र में और राज्य में मंत्री पद तक रहे हैं। एक बार तो सहारनपुर ने उप्र को मुख्यमंत्री भी दिया है। लेकिन सहारनपुर के दिन नहीं फिरे, वह आज भी विकास में पिछड़ा हुआ ही माना जाता है। इतना कि शहर एक स्थायी बस अड्डे के लिए भी तरस रहा है।

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