उत्तराखंड के पवित्र बदरीनाथ धाम में भगवान बदरीविशाल के अभिषेक के लिए प्रयुक्त होने वाले गाडू घड़ा अनुष्ठान की सदियों पुरानी परंपरा इस वर्ष एक ऐतिहासिक मोड़ पर पहुंची। टिहरी राजघराने द्वारा 17वीं सदी से निभाई जा रही इस परंपरा को अब अगली पीढ़ी को सौंप दिया गया है। महारानी माला राज्यलक्ष्मी शाह ने इसकी विधिवत घोषणा करते हुए बताया कि अब यह धार्मिक दायित्व उनकी नातिनी निभाएंगी।
इस अनूठे अनुष्ठान में भगवान बदरीविशाल के अभिषेक के लिए तिलों से विशेष विधि द्वारा निकाला गया तेल प्रयोग होता है। यह परंपरा वसंत पंचमी से शुरू होती है, जब बदरीनाथ के डिम्मर गांव के पुजारी गाडू घड़ा लेकर नरेंद्रनगर राजदरबार पहुंचते हैं। इसके बाद तय मुहूर्त में सुहागिन महिलाएं पारंपरिक विधियों से भुने हुए तिलों को पिरोकर तेल निकालती हैं। यही पवित्र तेल बदरीनाथ मंदिर भेजा जाता है। महारानी माला राज्यलक्ष्मी शाह ने कहा, “हमने यह परंपरा युगों से निभाई है और अब अगली पीढ़ी को इसे सौंपकर हमें गर्व है कि यह आस्था की डोर भविष्य में भी मजबूती से बंधी रहेगी।” उनकी नातिनी अब इस प्रक्रिया में सक्रिय रूप से भाग लेने लगी हैं और धार्मिक ज्ञान प्राप्त कर रही हैं।
तेल पिरोने की यह प्रक्रिया लगभग 8 से 10 घंटे तक चलती है। इसमें शामिल महिलाओं को धार्मिक रूप से शुद्ध और पारंपरिक विधियों में पारंगत होना आवश्यक होता है। परिवार में किसी की मृत्यु होने या धार्मिक अयोग्यता होने पर वे इसमें भाग नहीं ले सकतीं। सरिता जोशी पिछले 35 वर्षों से इस अनुष्ठान में भाग ले रही हैं। उन्होंने बताया कि यह सेवा उन्हें उनकी सास से विरासत में मिली। “मैं बदरीनाथ कभी नहीं जा सकी, लेकिन यह सेवा ही मेरे लिए भगवान के दर्शन जैसी है,” उन्होंने भावुक होते हुए कहा।