परमार्थ निकेतन प्रमुख स्वामी चिदानन्द ने वेद विज्ञान सम्मेलन में प्रतिभाग किया

वेदों के दिव्य मंत्र जीवन के लिये वरदान

एसकेविरमानी / ऋषिकेश। परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने दिल्ली में आयोजित अखिल भारतीय वेद विज्ञान सम्मेलन में सहभाग कर डिजिटल इन्डिया के साथ डिवाइन इन्डिया का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि इन दो दिनों में सभी ने वेदों को जाना, माना और जिया, सुना और सीखा। अब समय आ गया है कि हमारे जवानों को भी यही दिशा प्रदान करें।

आज का भारत महाभारत की ओर नहीं बल्कि महान भारत की ओर बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि बाहर के युद्ध मिसाइल से जीते जा सकते हैं परन्तु अन्दर के युद्ध के लिये तो वेदों द्वारा बताये गये ध्यान व मेडिटेशन के द्वारा ही जीता जा सकता है। साइंस हमें बड़ा-बड़ा बनाना बता सकती है परन्तु बढ़िया बनना है तो वेदों को जीना होगा। आज भारत को हेट स्पीच की नहीं बल्कि हार्ट स्पीच की जरूरत है। अपनी संस्कृति, अपनी जड़ों, अपने मूल्यों की ओर लौटना अर्थात वेदों की ओर लौटना इसी की आज जरूरत है।

पूर्व राष्ट्रपति भारत  रामनाथ कोविंद  ने कहा कि हमारी सोच सदैव नये विचारों और ज्ञान को प्राप्त करने के लिये अग्रसर रहे। जिज्ञासु वृति ज्ञान प्राप्त करने के लिये अति आवश्यक है इसका उल्लेख कठोपनिषद् में किया गया है, इसमें कहा गया है ‘उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्त वरान्निबोधत’ अर्थात हे मनुष्यों उठो, जागो और सचेत रहो। श्रेष्ठ अर्थात ज्ञानी पुरूषों के पास जाकर ज्ञान प्राप्त करो। उन्होंने कहा कि वेद वैदिक परम्परा का मूल है। वेद सर्वोच्च, शाश्वत और मूल है। हमारे वेद कानून व्यवस्था के सूत्र हैं और सामाजिक कल्याण के लिये अत्यंत महत्वपूर्ण है। हमारे देश का आदर्श वाक्य ‘सत्यमेव जयते्’ मुण्डकोपनिषद् से लिया गया है। इस आदर्श सूत्र वाक्य में मानव जगत की सीमा निर्धारित है। सत्य की सदा विजय हो और असत्य की पराजय हो, सत्य और असत्य सभ्यता के आरंभ से ही धर्म के केन्द्र में रहा है। इस अवसर पर उन्होंने महाग्रंथ रामायण, महाभारत और दानवीर कर्ण के प्रसंग का भी उल्लेख किया।

उन्होंने कहा कि जितना हम प्रकृति के साथ चलेगे उतने ही आगे बढ़ेंगे, अगर विषलेषण किया जाये तो जीवन के हर विषय के बारे में वेद हमारा मार्गदर्शन करते हैं।

स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि वेद, सनातन संस्कृति के प्राचीनतम ग्रन्थ हैं। वेद विश्व की सबसे प्राचीन लिखित कृतियों में से एक हैं इसलिये वेदों को संसार का आदिग्रंथ कहा गया है। वेद शब्द का अर्थ ही है “ज्ञान”। वेद अपौरुषेय हंै अर्थात् ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद मानव रचित नहीं हैं परन्तु ज्ञान का अपार भण्डार है वेदों में। वेद, मानव सभ्यता एवं भारतीय संस्कृति के सबसे पुराने महाग्रंथ व लिखित साहित्यिक दस्तावेज़ हैं।

वेदों में आध्यात्मिकता और वैज्ञानिकता, चिकित्सा और स्वस्थ दिनचर्या के अलावा स्वाधीनता और समानता का भी स्पष्ट उल्लेख किया गया है। महिलाओं और पुरूषों के समान शिक्षा और समानता के व्यवहार पर विस्तृत चर्चा है, जो वर्तमान युग की सबसे प्रमुख आवश्यकताओं में से एक है। वेदों में उत्कृष्ट नीतिशास्त्र का वर्णन किया गया है जो कि हर युग के लिये प्रासंगिक है।

वेदों में बताया गया है कि धर्म, अर्थ काम और मोक्ष ये चार पुरूषार्थ, साध्य नहीं बल्कि साधन हंै। मनुष्य स्व के साथ परमार्थ का भी ध्यान रखे और अपने कर्तव्यों का निर्वहन ठीक से करता रहे यह शिक्षा हमें वेदों के दिव्य मंत्र देते हैं। नैतिक कर्म एवं आचरण, शुभ की प्राप्ति हेतु किये गये कर्म, सत्य बोलना आदि मानव मूल्यों का समावेश बड़ी ही उत्कृष्टता के साथ वेदों में किया गया है। मनुष्य को धर्माचरण, अर्थ नैतिकता अर्थात नैतिक मूल्यों का पालन करते हुये धन का अर्जन, दूसरों को बिना दुख पहुंचाये अपने सुखों का उपभोग करते हुये बन्धन मुक्त जीवनयापन करना यह ज्ञान वेदों में समाहित है जिसें संरक्षित कर एक शान्तिपूर्ण दुनिया का निर्माण किया जा सकता हैैै।

स्वामी जी ने कहा कि भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों में से एक है, जिसमें मानव कल्याण समाहित है। इसमें जीवन के प्रति वैज्ञानिक, आध्यात्मिक दृष्टिकोण का अदृभुत समन्वय है। भारतीय वैदिक संस्कृति में वसुधैव कुटुंबकम्, विश्व एक परिवार है का उदार दृष्टिकोण है और आज भी भारतीयों की इसमें गहरी आस्था है। शारीरिक, मानसिक और आत्मिक शक्तियों का विकास ही इस संस्कृति का पूर्ण स्वरूप है। वेद शान्ति और संस्कृति ही नहीं बल्कि जीवन और जीविका तथा समृद्धि और मुक्ति देने वाले है। ऋग्वेद में वैश्विक कल्याण के लिये बड़ा ही दिव्य मंत्र है ’’लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु।’’

श्री रामलाल ने कहा कि पिछले 12 सौ वर्षो में भारत में अनेक उतार-चढ़ाव आये, भारत को मिटाने की, भारत को बांटने की और भारत के मानस को बदलने की कोशिश की परन्तु अब पूरा विश्व यह स्वीकार करने लगा है कि भारत की जीवन शैली अधिक स्वस्थ्य और स्वच्छ है।

स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने सभी विशिष्ट अतिथियों को हिमालय की भेंट रूद्राक्ष का पौधा भेंट का परमार्थ निकेतन गंगा आरती में सहभाग हेतु आमंत्रित किया। इस अवसर पर आचार्य दीपक शर्मा , प्रोफसर रचना बिमल , परमार्थ निकेतन, ऋषिकेश और कोटद्वार के ऋषिकुमार आदि उपस्थित रहे।

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