जीवन का एकमात्र लक्ष्य मुक्ति है उसे पाने के लिए समय भी सीमित : आचार्य प्रशान्त

कार्यशाला में आचार्य प्रशान्त ने साधकों के प्रश्नों का दिया जवाब

एसकेविरमानी / ऋषिकेश। प्रशांतअद्वैत संस्था के संस्थापक एवं पूर्व सिविल सेवा अधिकारी आचार्य प्रशांत ने ऋषिकेश में आयोजित दो दिवसीय कार्यशाला में ‘काल’ अर्थात समय की वेदान्तिक व्याख्या की। इस कार्यशाला में भारतवर्ष के अनेक राज्यों से आए जिज्ञासुओं ने भाग लिया। इस दो दिवसीय कार्यक्रम का लाभ विदेशों में भी ऑनलाइन के माध्यम से हो रहा है।

आचार्य प्रशान्त ने कहा कि समय के प्रवाह का विज्ञान समझना पड़ेगा। विचार और समय के बीच का संबंध साफ़ साफ़ देखना होगा, तभी हम जीवन के सबसे बहुमूल्य संसाधन, समय, का सम्यक उपयोग कर पाएंगे। आचार्य प्रशांत ने कहा कि सही केंद्र के उठे कर्म को प्राथमिकता देना समय के प्रबंधन का एक बहुत प्रभावी तरीका है।

उन्होंने कहा कि हम भूल जाते हैं कि हमारे पास सीमित समय है। और इस भूल के फलस्वरूप हम जीवन को गलत कर्मों और निर्णयों से भर देते हैं और सही कर्म को सतत टालते रहते हैं। आचार्य प्रशांत ने कहा कि समय के महत्व को पहचानना ज़रूरी है। विचार, कल्पनाएं, मान्यताए सभी अतीत के मुद्दे हैं। जीवन को सही दिशा देने के लिए भ्रम से बाहर निकलना होगा तभी ऊंची चुनौती से जूझा जा सकेगा, अन्यथा छोटे छोटे मुद्दों में उलझकर अपना जीवन व्यर्थ कर बैठेंगे।उन्होंने वर्तमान का वास्तविक अर्थ समझाया तथा कहा कि कैसे सब कुछ लगातार बदल रहा है और कुछ भी कभी स्थिर नहीं है,

प्रशान्त अद्वैत संस्था के संस्थापक एवं पूर्व सिविल सेवा अधिकारी आचार्य प्रशांत ने कहा कि दुःख से मुक्ति का एकमात्र साधन अध्यात्म है। दुःख को लोग स्वीकार ही नहीं करते इसलिए वह गहरी कुंठा व निराशा से घिर जाते हैं। जब दुख को स्वीकार कर लिया जाता है तो दुख भी धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है।

उन्होंने कहा कि दुनिया के बाज़ार में तमाम ‘मोटिवेशनल’ गुरु घूम रहे हैं; और यही मोटिवेशन लोगों के डिप्रेशन का कारण बन रहा है। इतना डिप्रेशन आज तक कभी नही रहा जितना आज हो रहा है। जो अपने लिए एक सीमित दायरा तय कर लेते हैं ज़िंदगी भर उसी से ही बन्ध कर रह जाते हैं – वही घर, परिवार, बच्चे, नौकरी उसी में जीवन समाप्त हो जाता है।

आचार्य प्रशांत ने कहा कि आज इंसान सब कुछ देख कर भी दुख-दर्द झेल रहा है, लेकिन सुधरने को तैयार नही है। उन्होंने कहा कि अकेलापन आज दुःख की मुख्य वजह बन रहा है, जबकि वास्तविक अकेलापन आंतरिक होता है। मन मे तरह तरह के चलने वाले विचार ही दुःख का कारण बनते हैं इसकी मुख्य वजह आंतरिक खोखलापन है यह मानसिक वजह से ही होता है।

उन्होंने ये भी कहा कि जो आपको मुक्ति की ओर ले जाये वही अध्यात्म है। इंसान का प्रथम लक्ष्य भी यही होना चाहिए। मन मे विचार तो चलते ही रहेंगे देखना यह है कि विचार उठ कहाँ से रहा है। उन्होंने कहा कि कर्म के रास्ते ही मुक्ति मिलती है।

उन्होंने कहा कि आज दुनिया तबाही के कगार पर खड़ी है पर हम अब भी नहीं समझ पा रहे। धर्म के नाम पर हमारे मन में तमाम तरह की छवियां बैठा दी जाती हैं जबकि जीव का एकमात्र लक्ष्य मुक्ति ही होना चाहिए। हमने ऋषियों का भी मज़ाक बना दिया है। हम उनको आज तक समझ ही नही पाए। सत्र के दौरान कबीर भजन आऊंगा न जाऊंगा जीऊंगा न मरूँगा व अबसर बार बार न आवे कबीर साहब के दोहे व रामचरित मानस की चौपाई भी गाये गए जिससे पूरा माहौल अध्यात्ममय हो गया।

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